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कनुप्रिया (मंजरी परिणय – आम्र-बौर का गीत) November 17, 2005

Posted by Jaya in Dharmveer Bharti.
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यह जो मैं कभी-कभी चरम साक्षात्कार के क्षणों में
बिलकुल जड़ और निस्पंद हो जाती हूँ
इस का मर्म तुम समझते क्यों नहीं साँवरे!

तुम्हारी जन्म-जन्मांतर की रहस्यमयी लीला की
एकान्त-संगिनी मैं
इन क्षणों में अकस्मात्
तुम से पृथक् नहीं हो जाती मेरे प्राण,
तुम यह क्यों नहीं समझ पाते कि लाज
सिर्फ जिस्म की नहीं होती
मन की भी होती है
एक मधुर भय
एक अनजाना संशय,
एक आग्रह भरा गोपन,
एक निर्व्याख्या वेदना; उदासी,
जो मुझे बार-बार चरम सुख के क्षणों में भी
अभिभूत कर लेती है।

भय, संशय, गोपन, उदासी
ये सभी ढीठ, चंचल, सरचढ़ी सहेलियों की तरह
मुझे घेर लेती हैं
और मैं चाह कर भी तुम्हारे पास ठीक उसी समय
नहीं पहुँच पाती जब आम्र मंजरियों के नीचे
अपनी बाँसुरी में मेरा नाम भर भर के मुझे बुलाते हो!
उस दिन तुम उस बौर लदे आम की
झुकी डालियों से टिके कितनी देर मुझे वंशी से टेरते रहे
ढलते सूरज की उदास काँपती किरणें
तुम्हारे माथे के मोरपंखों
से बेबस विदा माँगने लगीं –
मैं नहीं आयी

यमुना के घाट पर
मछुओं ने अपनी नावें बाँध दीं
और कंधों पर पतवारें रख चले गये –
मैं नहीं आयी

तुम ने वंशी होठों से हटा ली थी
और उदास, मौन, तुम आम्र-वृक्ष की जड़ों से टिक कर
बैठ गये थे
और बैठे रहे, बैठे रहे, बैठे रहे
मैं नहीं आयी, नहीं आयी, नहीं आयी
तुम अन्त में उठे
एक झुकी टाल पर खिला एक बौर तुमने तोड़ा
और धीरे-धीरे चल दिये
अनमने तुम्हारे पाँव पगडंडी पर चल रहे थे
पर जानते हो तुम्हारे अनजान में ही तुम्हारी उँगलियाँ
क्या कर रही थीं!
वे उस आम्र मंजरी को चूर-चूर कर
श्यामल वनघासों में बिछी उस माँग-सी उजली पगडण्डी पर
बिखेर रहीं थीं…

यह तुम ने क्या किये प्रिय!
क्या अनजाने में ही
उस आम के बौर से मेरी क्वाँरी उजली पवित्र माँग
भर रहे थे साँवरे?
पर मुझे देखो कि मैं उस समय भी तो माथा नीचा कर
इस अलौकिक सुहाग से प्रदीप्त हो कर
माथे पर पल्ला डाल कर
झुक कर तुम्हारी चरणधूलि ले कर
तुम्हें प्रणाम करने –
नहीं आयी, नहीं आयी, नहीं आयी!

पर मेरे प्राण
यह क्यों भूल जाते हो कि मैं वही
बावली लड़की हूँ न जो – कदम्ब के नीचे बैठ कर
जब तुम पोई की जंगली लतरों के पके फलों को
तोड़ कर, मसल कर, उन की लाली से मेरे पाँवों को
महावर रचने के लिए अपनी गोद में रखते हो
तो मैं लाज से धनुष की तरह दोहरी हो जाती हूँ
और अपने पाँव पूरे बल से समेट कर खींच लेती हूँ
अपनी दोनों बाँहों में अपने घुटने कस
मुँह फेर कर निश्चल बैठ जाती हूँ
पर शाम को जब घर आती हूँ तो
निभृत एकांत में दीपक के मन्द आलोक में
अपने उन्हीं  चरणों को
अपलक निहारती हूँ
बावली-सी उन्हें प्यार करती हूँ
जल्दी-जल्दी में अधबनी उन महावर की रेखाओं को
चारों ओर देख कर धीमे-से
चूम लेती हूँ।


रात गहरा गई है
और तुम चले गए हो
और मैं कितनी देर तक बाँह से
उसी आम्र डाली को घेरे चुपचाप रोती रही हूँ
जिस पर टिक कर तुम मेरी प्रतीक्षा करते हो

और मैं लौट रही हूँ,
हताश, और निष्फल
और ये आम के बौर के कण-कण
मेरे पावों में बुरी तरह साल रहे हैं।
पर तुम्हें यह कौन बतायेगा साँवरे
कि देर ही में सही
पर मैं तुम्हारे पुकारने पर आ तो गयी
और माँग-सी उजली पगडंडी पर बिखरे
ये मंजरी कण भी अगर मेरे चरणों में गड़ते हैं तो
इसी लिए न कि कितने लंबा रास्ता
कितना जल्दी-जल्दी पार कर मुझे आना पड़ा है
और काँटों और काँकरियों से
मेरे पाँव किस बुरी तरह घायल हो गये हैं!

यह कैसे बताऊँ तुम्हें
कि चरम साक्षात्कार के ये अनूठे क्षण भी
जो कभी-कभी मेरे हाथ से छूट जाते हैं
तुम्हारी मर्म-पुकार जो मैं कभी-कभी मैं नहीं सुन पाती
तुम्हारी भेंट की अर्थ जो नहीं समझ पाती
तो मेरे साँवरे-
लाज मन की भी होती है

एक अज्ञात भय,
अपरिचित संशय,
आग्रह भरा गोपन,
और सुख के क्षण
में भी घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी-

फिर भी उसे चीर कर
देर में ही आऊँगी प्राण,
तो क्या तुम मुझे अपनी लम्बी
चन्दन-बाँहों में भर कर बेसुध नहीं
कर दोगे?

Comments»

1. pawan mishra - July 30, 2009

touching lines

2. ravi rai - October 25, 2009

nice poetry

3. ragini gupta - November 24, 2010

a very big poem

4. Devi Nangrani - December 10, 2010

यह कैसे बताऊँ तुम्हें
कि चरम साक्षात्कार के ये अनूठे क्षण भी
जो कभी-कभी मेरे हाथ से छूट जाते हैं
ati sunder sach ke saamne aaina

5. Frescoes - August 20, 2011

lovely!

6. कनुप्रिया (मंजरी परिणय – आम्र-बौर का गीत) (via Hindi Poetry Collection) « Frescoes - August 20, 2011

[…] यह जो मैं कभी-कभी चरम साक्षात्कार के क्षणों मेंबिलकुल जड़ और निस्पंद हो जाती हूँइस का मर्म तुम समझते क्यों नहीं साँवरे!तुम्हारी जन्म-जन्मांतर की रहस्यमयी लीला कीएकान्त-संगिनी मैंइन क्षणों में अकस्मात्तुम से पृथक् नहीं हो जाती मेरे प्राण,तुम यह क्यों नहीं समझ पाते कि लाजसिर्फ जिस्म की नहीं होतीमन की भी होती हैएक मधुर भयएक अनजाना संशय,एक आग्रह भरा गोपन,एक निर्व्याख्या वेदना; उदासी,जो मुझे बार-बार चरम सुख के क्षणों में भीअभिभूत कर लेती है।भय, संशय, … Read More […]

7. MUMUKSH - November 1, 2011

abhe gadhe konsa poet hai


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