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कनुप्रिया (पूर्वराग – दूसरा गीत) November 9, 2005

Posted by Jaya in Dharmveer Bharti.
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यह जो अकस्मात्
आज मेरे जिस्म के सितार के
एक-एक तार में तुम झंकार उठे हो –
सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
तुम कब से मुझ में छिपे सो रहे थे।

सुनो, मैं अक्सर अपने सारे शरीर को –
पोर-पोर को अवगुण्ठन में ढँक कर तुम्हारे सामने गयी
मुझे तुमसे कितनी लाज आती थी,
मैंने अक्सर अपनी हथेलियों में
अपना लाज से आरक्त मुँह छिपा लिया है
मुझे तुमसे कितनी लाज आती थी
मैं अक्सर तुमसे केवल तम के प्रगाढ़ परदे में मिली
जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझता था
मुझे तुमसे कितनी लाज आती थी,

पर हाय मुझे क्या मालूम था
कि इस वेला में जब अपने को
अपने से छिपाने के लिए मेरे पास
कोई आवरण नहीं रहा
तुम मेरे जिस्म के एक-एक तार से
झंकार उठोगे
सुनो! सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
इस क्षण की प्रतीक्षा मे तुम
कब से मुझ में छिपे सो रहे थे!

Comments»

1. Apoorva Mandloi - June 8, 2009

A great collection of the poetry and really reminded of me of shcool days ……….great

2. Raksha - October 16, 2011

these poems are too long….

3. Nischitha - October 17, 2011

Who is the author of this poem ??


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