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कनुप्रिया (पूर्वराग – पाँचवाँ गीत) November 9, 2005

Posted by Jaya in Dharmveer Bharti.
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यह जो मैं गृहकाज से अलसा कर अक्सर
इधर चली आती हूँ
और कदम्ब की छाँह में शिथिल, अस्तव्यस्त
अनमनी-सी पड़ी रहती हूँ…

यह पछतावा अब मुझे हर क्षण
सालता रहता है कि
मैं उस रास की रात तुम्हारे पास से लौट क्यों आयी?
जो चरण चुम्हारे वेणुमादन की लय पर
तुम्हारे नील जलज तन की परिक्रमा देकर नाचते रहे
वे फिर घर की ओर उठ कैसे पाये
मैं उस दिन लौटी क्यों –
कण-कण अपने को तुम्हें दे कर रीत क्यों नहीं गयी?
तुम ने तो उस रास की रात
जिसे अंशतः भी आत्मसात् किया
उसे सम्पूर्ण बना कर
वापस अपने-अपने घर भेज दिया

पर हाय वही सम्पूर्णता तो
इस जिस्म के एक-एक कण में
बराबर टीसती रहती है,
तुम्हारे लिए!

कैसे हो जी तुम?
जब जाना ही नहीं चाहती
तो बाँसुरी के एक गहरे आलाप से
मदेन्मत्त मुझे खींच बुलाते हो

और जब वापस नहीं आना चाहती
तब मुझे अंशतः ग्रहण कर
सम्पूर्ण बना कर लौटा देते हो!

Comments»

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2. ravi khurana - May 14, 2012

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