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मधुबाला October 18, 2005

Posted by Jaya in Harivansh Rai Bachchan.
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1

मैं मधुबाला मधुशाला की,
मैं मधुशाला की मधुबाला!
मैं मधु-विक्रेता को प्यारी,
मधु के धट मुझपर बलिहारी,
प्यालों की मैं सुषमा सारी,
मेरा रुख देखा करती है
मधु-प्यासे नयनों की माला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

2

इस नीले अंचल की छाया
में जग-ज्वाला का झुलसाया
आकर शीतल करता काया,
मधु-मरहम का मैं लेपन कर
अच्छा करती उर का छाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

3

मधुघट ले जब करती नर्तन,
मेरे नूपुर के छम-छनन
में लय होता जग का क्रंदन,
झूमा करता मानव जीवन
का क्षण-क्षण बनकर मतवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

4

मैं इस आँगन की आकर्षण,
मधु से सिंचित मेरी चितवन,
मेरी वाणी में मधु के कण,
मदमत्त बनाया मैं करती,
यश लूटा करती मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

5

था एक समय, थी मधुशाला,
था मिट्टी का घट, था प्याला,
थी, किन्तु, नहीं साकीबाला,
था बैठा ठाला विक्रेता
दे बंद कपाटों पर ताला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

6

तब इस घर में था तम छाया,
था भय छाया, था भ्रम छाया,
था मातम छाया, गम छाया,
ऊषा का दीप लिए सर पर,
मैं आई करती उजियाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

7

सोने की मधुशाना चमकी,
माणित द्युति से मदिरा दमकी,
मधुगंध दिशाओं में चमकी,
चल पड़ा लिए कर में प्याला
प्रत्येक सुरा पीनेवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

8

थे मदिरा के मृत-मूक घड़े,
थे मूर्ति सदृश मधुपात्र खड़े,
थे जड़वत् प्याले भूमि पड़े,
जादू के हाथों से छूकर
मैंने इनमें जीवन डाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

9

मुझको छूकर मधुघट छलके,
प्याले मधु पीने को ललके ,
मालिक जागा मलकर पलकें,
अँगड़ाई लेकर उठ बैठी
चिर सुप्त विमूर्च्छित मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

10

प्यासे आए, मैंने आँका,
वातायन से मैंने झाँका,
पीनेवालों का दल बाँका,
उत्कंठित स्वर से बोल उठा,
‘कर दे पागल, भर दे प्याला!’
मैं मधुशाला की मधुबाला!

11

खुल द्वार गए मदिरालय के,
नारे लगते मेरी जय के,
मिट चिह्न गए चिंता भय के,
हर ओर मचा है शोर यही,
‘ला-ला मदिरा ला-ला’!,
मैं मधुशाला की मधुबाला!

12

हर एक तृप्ति का दास यहाँ,
पर एक बात है खास यहाँ,
पीने से बढ़ती प्यास यहाँ,
सौभाग्य मगर मेरा देखो,
देने से बढ़ती है हाला!
मैं मधुशाला की मधुबाला!

13

चाहे जितना मैं दूँ हाला,
चाहे जितना तू पी प्याला,
चाहे जितना बन मतवाला,
सुन, भेद बताती हूँ अन्तिम,
यह शांत नही होगी ज्वाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

14

मधु कौन यहाँ पीने आता,
है किसका प्यालों से नाता,
जग देख मुझे है मदमाता,
जिसके चिर तंद्रिल नयनों पर
तनती मैं स्वप्नों का जाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

15

यह स्वप्न-विनिर्मित मधुशाला,
यह स्वप्न रचित मधु का प्याला,
स्वप्निल तृष्णा, स्वप्निल हाला,
स्वप्नों की दुनिया में भूला
फिरता मानव भोलाभाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

Other Information

Collection: Madhubala (Published: 1936)

Comments»

1. Tushar. - December 27, 2006

The poem is excellent.

2. deepali - June 28, 2007

this is a marvelous poem & of course excellent poem !!!!!!!!!

3. akanksha - June 28, 2007

this is a beautiful poem & of course excellent poem !!!!!!!!!

4. avtar singh sini - October 5, 2007

excelent work.. i love it ….

5. Ravi singh - February 1, 2008

This is a very beautiful poem

6. PRIYANKA RAJ - June 19, 2008

I THINK THIS POEM EXRESS EMOTION OF A SLAVE HELPLESS LADY FROM VERY CORE OF HER HEART SO , I LIKE THIS POEM BUT I TOO RESPECT IT .

7. RIYAJ - December 18, 2008

It is one of the most memorable thing in hindi litreture

8. aharnish - September 10, 2009

kya ghatiya coment dete ho.. i want to focus out priyaka what did u say . is it express emotion of slave lady . no never .. it’s a just a second volume of madhushala. but it not beutiful like that.

9. ananya - February 4, 2010

i like this poem very much..bcoz i got first prize in poem recitation by singing this poem….and the poem is also very beautiful…..

Aakash - August 11, 2012

Nice,

10. kanishk - May 28, 2010

wah wah …kirpya http://www.divane.in join kar ke vahan par v aap apne divano ka maan bdayein

11. Arind Singh Bisht - October 22, 2010

excellent poem …………

12. Shivdutt thakur - February 8, 2011

There is no onelike kavisiromani Harivansh Ray ‘Bachan’ is born.
He only one creature of god.
I about them some where that
“DUNIA MEN HUN DUNIA KA TALBGAR NAHI HUN”
“BAZAR SE GUJRA HUN KHRIDAR NAHI HUN”

13. Shivdutt thakur - February 8, 2011

Gurudev is only creature of god.
I read something about them some where that
“DUNIA MEN HUN DUNIA KA TALABGAR NAHI HUN”
“BAZAR SE GUJRA HUN KHARIDAR NAHI HUN”

14. Mohit tiwari - September 5, 2011

i like this poem very muche xcellent poem

15. Madhushala Ki Madhubala « FRESCOES - December 10, 2011

[…] Bachchan, ‘Madhubala’, 1936) GA_googleAddAttr("AdOpt", "1"); GA_googleAddAttr("Origin", "other"); […]

16. chandan mishra - March 1, 2012

this peom is very important for sahitya student thanks for bachhan sahaib

17. anvesha bali - July 4, 2012

hi poem i marvelous poem of the world

anvesha bali - July 4, 2012

this poem is marvrlous poem of the world

18. Aakash - August 11, 2012
19. Vishwas - August 25, 2012

Marvellous poem ….written very nicely….left spellbound after listening

20. Vishal gupta - November 12, 2012

Jeevan ke bhavo ko bahut hi sundarta se samanvit kiya

21. Lavanya hingorani - November 21, 2012

its fantastic,lovely…..

22. swati pal - November 7, 2013

This poem is so beautiful that it touches my heart

23. jaikant patel - March 22, 2014

madhu se jyada madhubala madak nazar aa rahi hai

24. vikash kumar - June 23, 2014

I have read this amaging poem .which can easily define the rytham of poem.in future i wish i will also able to write this type of poem.

25. Anuj - August 13, 2014

nice poem

26. बच्चन | suchakumesh - November 10, 2014

[…] मधुबाला October 18, 2005 […]

27. Manish Pandey - March 18, 2015

madhubala is nice poem.

28. Manish Pandey - March 18, 2015

harivans rai bachachan was a great poetry.

29. shruti kakkar - January 11, 2016

Awesome poem by d huge writtr..tooooo interesting..


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